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Wednesday, August 22, 2012

हॉकी विश्व कप विजेता की सूची


वर्ष
मेजबान
अंतिम
विजेता
स्कोर
हरकारा
1971
बार्सिलोना, स्पेन
पाकिस्तान
1-0
स्पेन
1973
आम्सटलवेन, नीदरलैंड्स

नीदरलैंड
2-2 
(4-2) 
पेनल्टी स्ट्रोक

भारत
1975
कुआलालम्पुर, मलेशिया

भारत
2-1

पाकिस्तान
1978
ब्यूनस आयर्स, अर्जेंटीना

पाकिस्तान
3-2

नीदरलैंड
1982
मुम्बई (बम्बई), भारत

पाकिस्तान
3-1

पश्चिम जर्मनी
1986
लंदन, इंग्लैंड

ऑस्ट्रेलिया
2-1

इंग्लैंड
1990
लाहौर, पाकिस्तान

नीदरलैंड
3-1

पाकिस्तान
1994
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

पाकिस्तान
1-1 
(4-3) 
पेनल्टी स्ट्रोक

नीदरलैंड
1998
Utrecht, नीदरलैंड्स

नीदरलैंड
3-2 
अतिरिक्त समय के बाद

स्पेन
2002
कुआलालम्पुर, मलेशिया

जर्मनी
2-1

ऑस्ट्रेलिया
2006
Mönchengladbach, जर्मनी

जर्मनी
4-3

ऑस्ट्रेलिया
2010
नई दिल्ली, भारत

ऑस्ट्रेलिया
2-1

जर्मनी
2014
हेग, नीदरलैंड्स



Saturday, August 18, 2012

राजकुमार


Rajkumar
FCFC
संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राजकुमार का नाम फिल्म जगत की आकाशगंगा में ऐसे ध्रुव तारे की तरह है कि उनके बेमिसाल अभिनय से सुसज्जित फिल्मों की रोशनी से बॉलीवुड हमेशा जगमगाता रहेगा।

राजकुमार का जन्म पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में 8 अक्टूबर 1926 को एक मध्यमवर्गीय कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजकुमार मुंबई के माहिम पुलिस स्टेशन में बतौर सब इंस्पेक्टर काम करने लगे।

राजकुमार मुंबई के जिस थाने में कार्यरत थे, वहाँ अक्सर फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक बार पुलिस स्टेशन में फिल्म निर्माता कुछ जरूरी काम के लिए आए हुए थे और वे राजकुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने राजकुमार को यह सलाह दी कि अगर आप फिल्म अभिनेता बनने की ओर कदम रखें तो उसमें काफी सफल हो सकते हैं।

राजकुमार को फिल्म निर्माता की बात काफी अच्छी लगी। इसके कुछ समय बाद राजकुमार ने नौकरी छोड़ दी और फिल्मों में बतौर अभिनेता बनने की ओर रुख कर लिया।

वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘रंगीली’ में सबसे पहले बतौर अभिनेता राजकुमार को काम करने का मौका मिला। वर्ष 1952 से 1957 तक राजकुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे।

फिल्म ‘रंगीली’ के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वे उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने अनमोल सहारा, अवसर, घमंड, नीलमणि जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।

वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ में राजकुमार गाँव के एक किसान की छोटी-सी भूमिका में दिखाई दिए। हालाँकि यह फिल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी, फिर भी राजकुमार इस छोटी-सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे।

इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और फिल्म की सफलता के बाद राजकुमार बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।

वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘पैगाम’ में उनके सामने हिन्दी फिल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, लेकिन राजकुमार अपनी सशक्त भूमिका के जरिए दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे।
Rajkumar
FCFC
इसके बाद राजकुमार दिल अपना और प्रीत पराई, घराना, गोदान, दिल एक मंदिर जैसी फिल्मों में मिली कामयाबी के जरिए दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गए जहाँ वे फिल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे।

वर्ष 1965 में बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘वक्त’ में राजकुमार का बोला गया एक संवाद ‘चिनाय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते हैं वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते’ या फिर ‘चिनाय सेठ, ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज नहीं है, हाथ कट जाए तो खून निकल आता है’ दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

फिल्म ‘वक्त’ की कामयाबी से राजकुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुँचे, लेकिन राजकुमार कभी भी किसी खास इमेज में नहीं बँधे। इसलिए अपनी इन फिल्मों की कामयाबी के बाद भी उन्होंने हमराज, नीलकमल, मेरे हूजूर, हीर रांझा में रूमानी भूमिका भी स्वीकार की, जो उनके फिल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी। इसके बावजूद राजकुमार दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहें।

‘पाकीजा’ में राजकुमार का बोला गया संवाद ‘आपके पाँव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा मैले हो जाएँगे’ इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोग गाहे-बगाहे राजकुमार की आवाज की नकल करने लगे।

वर्ष 1978 में प्रदर्शित फिल्म ‘कर्मयोगी’ में राजकुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए राजकुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया।

इस क्रम में वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘बुलंदी’ में वे चरित्र भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके और इस फिल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शकों का मन मोहे रखा।

इसके बाद राजकुमार ने कुदरत, धर्मकाँटा, शरारा, राजतिलक, मरते दम तक, जंगबाज जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर राज किया।

वर्ष 1991 में प्रदर्शित फिल्म ‘सौदागर’ में दिलीप कुमार और राजकुमार फिल्म ‘पैगाम’ के बाद दूसरी बार आमने-सामने थे। दिलीप कुमार और राजकुमार जैसे अभिनय की दुनिया के महारथियों का टकराव देखने लायक था। नब्बे के दशक में राजकुमार ने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया।

नितांत अकेले रहने वाले राजकुमार ने शायद यह महसूस कर लिया था कि मौत उनके काफी करीब है, इसीलिए अपने पुत्र पुरू राजकुमार को उन्होंने अपने पास बुलाया और कहा, ‘देखो मौत और जिंदगी इंसान का निजी मामला होता है। मेरी मौत के बारे में मेरे मित्र चेतन आनंद के अलावा और किसी को नहीं बताना। मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही फिल्म उद्योग को सूचित करना।’

3 जुलाई 1996 को अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राजकुमार इस दुनिया को अलविदा कह गए।

गुरुदत्त



Guru dutt
NDND
अक्‍टूबर का महीना था। मुंबई का मौसम कुछ-कुछ सुहावना हो चला था। ऐसे ही मौसम में देव आनंद और गीता दत्‍त के साथ गुरुदत्‍त ने जाने कितनी रातें मरीन ड्राइव और वर्ली के समुद्र तट पर भटकते हुए गुजारी थीं। लेकिन ये रात उन रातों से थोड़ी अलग थी। पैडर रोड स्थित किराए के एक फ्लैट में गुरुदत्‍त बिलकुल अकेले थे। जिंदगी से आजिज आ चुका एक अकेला, अवसादग्रस्‍त, अतृप्‍त कलाकार। तब कोई नहीं जानता था कि ये रात गुरुदत्‍त के जीवन की आखिरी रात होगी। आधी रात के करीब उन्‍होंने शराब में ढेर सारी नींद की गोलियाँ निगल लीं। रात बीती, सूरज उगा, लेकिन सदी के सबसे महान कलाकार की आत्‍मा का सूरज अस्‍त हो चुका था।

9 जुलाई, 1925 को मैसूर में एक मामूली हेडमास्‍टर और एक साधारण गृहिणी की संतान के रूप में वसंत शिवशंकर पादुकोण का जन्‍म हुआ। माँ की उम्र तब मुश्किल से 13 साल की रही होगी। बालक के लिए जिंदगी के रास्‍ते आसान नहीं थे। शुरू से ही आर्थिक परेशानियाँ और भावनात्‍मक एकाकीपन उसके हमराही रहे। माता-पिता के तनावपूर्ण संबंध, घरेलू दिक्‍कतें और 7 वर्षीय छोटे भाई की असमय मौत। पहले-पहल जिंदगी कुछ इस शक्‍ल में उसके सामने आई। यूँ ही नहीं उसने दुनिया को इतनी बेरहमी से ठुकराया था।

Guru Dutt
NDND
बचपन का वो उदास-गुमसुम बच्‍चा एक दिन ‘प्‍यासा’ के विजय और ‘कागज के फूल’ के असफल निर्देशक ‘सुरेश’ के रूप में हमारे सामने आता है और हम आश्‍चर्यचकित देखते रह जाते हैं। ये मोती यहीं कहीं था, हमारे इर्द-गिर्द, जिसे अब तक कोई देख नहीं पा रहा था।

किसी गहरे कवित्‍व और रचनात्‍मकता के बीज बहुत बचपन से ही उनके भीतर मौजूद थे। बत्‍ती गुल होने पर बालक गुरुदत्‍त दीये की टिमटिमाती लौ के सामने अपनी उँगलियों से दीवार पर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाता। उन दिनों यह दोनों छोटे भाइयों आत्‍माराम और देवीदास और इकलौती छोटी बहन ललिता के लिए सबसे मजेदार खेल हुआ करता था।
Guru Dutt
NDND
गुरुदत्‍त एक मेधावी विद्यार्थी थे, लेकिन अभावों के चलते कभी कॉलेज न जा सके। उदयशंकर की नृत्‍य मंडली में उन्‍हें बड़ा रस आता था। 1941 में मात्र 16 वर्ष की आयु में गुरुदत्‍त को उदयशंकर के अल्‍मोड़ा स्थिति इंडिया डांस सेंटर की स्‍कॉलरशिप मिली। पाँच वर्ष के इस वजीफे में प्रति वर्ष 75 रु. मिलने वाले थे, जो उस दौर के हिसाब से बड़ी बात थी। लेकिन यह शिक्षा अधूरी रह गई। पूरी दुनिया उस समय गहरी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी। भारत में आजादी की लड़ाई जोरों पर थी। द्वितीय विश्‍व युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। उदयशंकर को मजबूरन अपना स्‍कूल बंद करना पड़ा और गुरुदत्‍त घरवालों को ये बताकर कि कलकत्‍ते में उन्‍हें नौकरी मिल गई है, 1944 में कलकत्‍ता चले आए।

लेकिन बेचैन चित्‍त को चैन कहाँ। उसे एक टेलीफोन ऑपरेटर नहीं, ‘प्‍यासा’ और ‘कागज के फूल’ का निर्देशक होना था। उसी वर्ष प्रभात कंपनी में नौकरी करने वे पूना चले आए और यहीं उनकी मुलाकात देवानंद और रहमान से हुई। गुरुदत्‍त ने फिल्‍म ‘हम एक हैं’ से बतौर कोरियोग्राफर अपने फिल्‍मी सफर की शुरुआत की थी। फिर देवानंद की फिल्‍म ‘बाजी’ से निर्देशक की कुर्सी सँभाली। तब उनकी उम्र मात्र 26 वर्ष थी। उसके बाद ‘आर-पार’, ‘सीआईडी’, ‘मि. एंड मिसेज 55’ जैसी फिल्‍में गुरुदत्‍त के फिल्‍मी सफर के तमाम पड़ाव थे, लेकिन वह महान कृति अब भी समय के गर्भ में छिपी थी, जिसे आने वाले तमाम बरसों में भी हिंदी सिनेमा के इतिहास से मिटा पाना मुमकिन न होता।

19 फरवरी, 1957 को ‘प्‍यासा’ रिलीज हुई। यकीन करना मुश्किल था कि ‘आर-पार’ और ‘मि. एंड मिसेज 55’ के टपोरी नायक के भीतर ऐसा बेचैन कलाकार छिपा बैठा है। यह फिल्‍म आज भी बेचैन करती है। जैसा जिंदा संवाद इस फिल्‍म का अपने समय के साथ था, और ‘प्‍यासा’ के बिंबों में जैसे गुरुदत्‍त उस दौर और उसमें इंसानी जिंदगी के तकलीफदेह यथार्थ को रच रहे थे, वैसा उसके बाद फिर कभी संभव नहीं हो सका। सत्‍यजीत रे की सिनेमाई प्रतिभा से इनकार नहीं, लेकिन अपने समय का ऐसा जिंदा चित्रण उन्‍होंने भी नहीं किया है। उनकी अधिकांश फिल्‍में साहित्यिक कृतियों का उत्‍कृष्‍ट सिनेमाई संस्‍करण हैं।

‘प्‍यासा’ के दो वर्ष बाद आई ‘कागज के फूल’, जो बहुत हद तक गुरुदत्‍त की ही असल जिंदगी थी। ‘कागज के फूल’ एक असफल फिल्‍म साबित हुई। दर्शकों ने इसे सिरे से नकार दिया और गुरुदत्‍त फिर कभी निर्देशक की उस कुर्सी पर नहीं बैठे, जिस पर बैठे-बैठे फिल्‍म के नायक सुरेश सिन्‍हा की मौत होती है।
‘कागज के फूल’ भी एक महान फिल्‍म थी। कुछ मायनों में ‘प्‍यासा’ से भी आगे की कृति। गुरुदत्‍त का निर्देशन, अबरार अलवी के संवाद, वी.के. मूर्ति की सिनेमेटोग्राफी और एस. डी. बर्मन का संगीत। दिग्‍गजों का ऐसा संयोजन गुरुदत्‍त के ही बूते की बात थी। इस फिल्‍म की असफलता बहुत चौंकाती नहीं है। हिंदुस्‍तान जैसे देश में शायद यही मुमकिन था। ‘प्‍यासा’ को भी भारत से ज्‍यादा सफलता विदेशों में मिली। फ्राँस की जनता ने जिस पागलपन के साथ ‘प्‍यासा’ का स्‍वागत किया, वह खुद गुरुदत्‍त के लिए भी उम्‍मीद से परे था। गुरुदत्‍त की सिनेमाई समझ और उनके भीतर का कलाकार बेशक महान थे, लेकिन हमारे देश में एक कम उम्र युवक की दुखद मौत उसकी प्रसिद्धि का कारण ज्‍यादा बनी, न कि उसकी अपराजेय प्रतिभा।

गुरुदत्‍त के लिए जीवन बहुत आसान नहीं रहा। भीतर एक अतृप्‍त कलाकार की छटपटाहट थी। बाहर अवसादपूर्ण दांपत्‍य और प्रेम की गहन पीड़ा, तोड़ देने वाला अकेलापन। अकेलेपन के ऐसे ही एक क्षण में उन्‍होंने अपना जीवन खत्‍म कर लिया था। संसार छूट गया और यहाँ के सारे गम भी। लेकिन उन्‍हें जानने वाले ये कभी समझ ही न सके कि अकेलेपन और अवसाद का वह कैसा सघनतम क्षण रहा होगा, जब किसी को दुनिया से छूट जाना ही एकमात्र रास्‍ता जान पड़ा।

एक व्‍यावहारिक और चालबाज दुनिया उन्‍हें नहीं समझ सकती थी। उनके आसपास का कोई व्‍यक्ति उन्‍हें नहीं समझ पाया। ‘कागज के फूल’ की असफलता को गुरुदत्‍त स्‍वीकार नहीं कर सके। उसके बाद भी उन्‍होंने दो फिल्‍में बनाईं, लेकिन निर्देशन का बीड़ा नहीं उठाया। ‘कागज के फूल’ दर्शकों की संवेदना के दायरे में घुसी, लेकिन पहले नहीं, बल्कि गुरुदत्‍त की मौत के बाद। ऐसा भावुकतावाद कोई नई बात नहीं। जीते जी जिसे कोई पहचान नहीं पा रहा था, उसकी मौत ने उसे नायक बना दिया।

‘प्‍यासा’ का विजय यूँ ही नहीं इस दुनिया को ठुकराता। उसकी संवेदना इस दुनिया की समझ से परे है। उसे कोई समझता है तो सिर्फ गुलाबो (प्‍यासा की वेश्‍या) और शांति (कागज के फूल की अनाथ लड़की)।

कई सौ वर्षों की गुलामी झेलने वाले तीसरी दुनिया के एक गरीब मुल्‍क और एक पिछड़ी सामंती भाषा में रचे जा रहे सिनेमा की अपनी वस्‍तुगत सच्‍चाइयाँ थीं। जबकि गुरुदत्‍त इस यथार्थ से बहुत आगे थे। गुरुदत्‍त बेशक अपने वक्‍त से बहुत आगे के कलाकार थे। भारत देश और मुंबईया सिनेमा की जिन सीमाओं के बीच वे अपनी कालजयी कृतियाँ रच रहे थे, वह अपने आप में एक गहरी रचनात्‍मक तड़प को दर्शाती है। वह तड़प, जो जिंदगी के छूटने के साथ ही छूटी। लेकिन शायद पूरी तरह छूटी भी नहीं। अपने पीछे भी वो एक तड़प छोड़ गई। वही तड़प, जो आज भी ‘प्‍यासा’ और ‘कागज के फूल’ देखते हुए हमें अपने भीतर महसूस होती है। एक तड़प, जो सुंदर फूलों की ‘प्‍यास’ में भटक रही है, लेकिन जिसके हिस्‍से आते हैं, सिर्फ ‘कागज के फूल’

* गुरुदत्त का जन्म 9 जुलाई 1925 को हुआ था।
* उनकी प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता में हुई थी।
* पहले उनका नाम वसंत कुमार पादुकोण था।
* गुरुदत्त के पिता का नाम शिवशंकर पादुकोण और माता का नाम वासंती पादुकोण था।
* उनके पिता हेडमास्टर थे। बाद में वे बैंक में काम करने लगे।
* उनकी माता स्कूल में अध्यापिका होने के अलावा लघु कथाएँ भी लिखती थीं। साथ ही वे बंगाली उपन्यासों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद करती थीं।
* गुरुदत्त का जब जन्म हुआ तब उनकी माता की उम्र केवल 13 वर्ष थी।
* परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण गुरुदत्त का बचपन अभावों में बीता।
* उनके छोटे भाई शशिधर की सात माह की उम्र में ही मौत हो गई थी, इससे गुरुदत्त बेहद दु:खी हुए थे।
* गुरुदत्त के दो भाई आत्माराम और देवीदास तथा एक बहन ललिता है।
* प्रख्यात निर्देशिक कल्पना लाजिमी उनकी बहन की बेटी हैं।
* कलकत्ता में स्कूली शिक्षा होने के कारण गुरुदत्त बंगाली भाषा अच्छी तरह बोल लेते थे।
* बचपन में गुरुदत्त की दादी जब आरती किया करती थीं, तब दीपक की रोशनी में अपने हाथों की परछाई से गुरुदत्त दीवार पर भिन्न-भिन्न आकृतियाँ बनाया करते थे।
* गुरुदत्त एक अच्छे विद्यार्थी थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण कॉलेज नहीं जा सकें।
* गुरुदत्त के अंकल ने 1944 में तीन वर्ष के अनुबंध पर पूना की प्रभात फिल्म कंपनी में उनकी नौकरी लगवाई।
* प्रभात में गुरुदत्त को कोरियोग्राफर के रूप में अनुबंधित किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें अभिनेता और सहायक निर्देशक की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई।
* यहीं पर गुरुदत्त के दो दोस्त बने- अभिनेता रहमान और देव आनंद। गुरुदत्त और देव आनंद एक ही लाँड्री पर कपड़े देते थे। एक दिन सेट पर देव आनंद ने गुरुदत्त को अपनी शर्ट पहने देखा। जब उन्होंने इस बारे में पूछा तो गुरुदत्त ने कहा कि उनके पास कोई दूसरा शर्ट नहीं था, इसलिए वे लाँड्री वाले से ये शर्ट ले आए। इसके बाद वो अच्छे दोस्त बन गए।
* गुरुदत्त और देव आनंद ने एक-दूसरे से ये वादा किया था कि यदि गुरुदत्त पहले निर्देशक बने तो वे देव को नायक लेंगे और यदि देव निर्माता बने तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। बाद में देव ने अपना वादा निभाया।
* गुरुदत्त ने 1944 में निर्मित ‘चाँद’ में श्रीकृष्ण का छोटा-सा रोल किया था। 1945 में वे फिल्म ‘लखरानी’ में विश्राम बेडेकर के सहायक निर्देशक बने। 1946 में पीएल संतोषी की फिल्म ‘हम एक हैं’ में वे सहायक निर्देशक के अलावा कोरियोग्राफर भी थे।
* 1947 में प्रभात से गुरुदत्त का अनुबंध समाप्त हुआ। इसके बाद लगभग 10 माह तक वे बेरोजगार रहें।
* इस दौरान गुरुदत्त ने अँग्रेजी भाषा में लिखना शुरू किया। उन्होंने ‘इलेस्ट्रेड वीकली’ में कई लघु कथाएँ लिखी।
* 1947 में गुरुदत्त बॉम्बे चले आएँ और अमिय चक्रवर्ती और ज्ञान मुखर्जी जैसे निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया।
* अपने निर्देशन की शुरूआत गुरुदत्त ने ‘बाज़ी’ (1951) से की थी।
* गुरुदत्त और गीता रॉय की मुलाकात ‘बाज़ी’ फिल्म के गाने के रेकॉर्डिंग के समय हुईं। दोनों में प्यार हुआ और 26 मई 1953 को दोनों ने शादी कर ली।
* 1954 में प्रदर्शित ‘आरपार’ के जरिए गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में ख्‍याति मिलीं।
* इसके बाद गुरुदत्त ने मि. एण्ड मिसेस 55 (1955), प्यासा (1957) और कागज के फूल (1959) जैसी शानदार फिल्में बनाईं।
* ‘कागज के फूल’ की असफलता ने गुरुदत्त को तोड़ दिया था। इस फिल्म को बनाने में उन्होंने खूब पैसा लगाया और जमकर मेहनत की।
* ‘कागज के फूल’ भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म थी। इस फिल्म में गुरुदत्त ने शेड और लाइट का जबरदस्त प्रयोग किया है।
* गाने के जरिये फिल्म की कहानी आगे बढ़ाने में गुरुदत्त को महारथ हासिल थी।
* गुरुदत्त अपनी फिल्मों में ज्यादातर क्लोज-अप शॉट लेते थे। उनका मानना था कि 80 प्रति‍शत अभिनय आँखों से किया जाता है।
* गुरुदत्त अपने काम से बेहद कम संतुष्ट होते थे। उन्हें अपने द्वारा बनाई गई हर फिल्म में कुछ ना कुछ कमी दिखाई देती थी। उनकी कई फिल्में इसलिए अधूरी रह गई कि वे उससे संतुष्ट नहीं थे।
* गुरुदत्त द्वारा निर्देशित ‘प्यासा’ को टाइम मैग्जीन ने 100 श्रेष्ठ फिल्मों में से एक माना है।
* अपनी मृत्यु के पहले गुरुदत्त ने माला सिन्हा से ‘बहारें फिर भी आएँगी’ के बारे में बात करने के लिए समय तय किया था।
* 10 अक्टोबर 1964 को नींद की गोली ज्यादा खाने की वजह से उनकी मौत हो गई। यह अभी तक रहस्य है कि उन्होंने आत्महत्या की या उनकी स्वाभाविक मौत हुई।

टिप-टिप बरसा पानी


Aishwarya
IFMIFM
एक कृषिप्रधान देश होने के कारण भारत में मानसून का विशेष महत्व है। शायद इसीलिए इसका असर बॉलीवुड की फिल्मों में भी देखने को मिलता है। बारिश में भीगते हुए नायक-नायिका पर गाना फिल्माने की परम्परा वर्षों पुरानी है।

भले ही असल जिंदगी में कोई भी फिल्मी अंदाज में भीगते हुए गाना गाते आपको नज़र नहीं आएगा, लेकिन परदे पर कलाकारों को ऐसा करते देख सभी को अच्छा लगता है।

राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ से वर्षा गीतों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह मणिरत्नम् की ‘गुरु’ तक जारी है। राजकपूर ने अपनी फिल्मों में इस तरह के कई गीत फिल्माए।

‘श्री 420’ का गीत ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ बरसाती गीतों में टॉप माना जाता है। कई वर्ष बीत जाने के बावजूद इस गीत का महत्व कम नहीं हुआ है और न ही इसकी टक्कर का कोई गीत आया।

कुछ लोग मधुबाला और किशोर कुमार पर फिल्माए गए ‘चलती का नाम गाड़ी’ के गीत ‘एक लड़की भीगी-भागी सी’ को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। नायक-नायिका एक-दूसरे को स्पर्श भी नहीं करते हैं और माहौल में मादकता भर जाती है।

बाद में निर्माताओं ने वर्षा-गीतों को देह प्रदर्शन का फार्मूला बना लिया। गीली और पारदर्शी साड़ी में लिपटी नायिका को परदे पर पेश करने का उन्हें एक बहाना मिल गया। एक दौर तो ऐसा आया था, जब हर वितरक अपने निर्माता से पूछता था कि फिल्म में वर्षा का कोई गीत है या नहीं।

अब नायिकाएँ इतने कम कपड़े पहनती हैं कि बरसाती गीत की भी जरूरत नहीं पड़ती। शायद इसीलिए इस तरह के गीतों का चलन आजकल कम हो गया है।

पेश है कुछ यादगार मानसून गीत :
* बरसात में हमसे मिले तुम सजन (बरसात - 1949)
* प्यार हुआ, इकरार हुआ (श्री 420 - 1955)
* इक लड़की भीगी-भागी-सी (चलती का नाम गाड़ी - 1958)
* ओ सजना, बरखा बहार आई (परख - 1960)
* रि‍मझिम के तराने लेकर आई बरसात (काला बाजार - 1960)
* जिंदगीभर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात (बरसात की रात - 1960)
* सावन की रातों में (प्रेमपत्र - 1962)
* बदरा छाए आधी रात (आया सावन झूम के - 1969)
* रूप तेरा मस्ताना (आराधना - 1969)
* हाय हाय ये मजबूरी (रोटी कपड़ा और मकान - 1974)
* रिमझिम गिरे सावन (मंजिल - 1979)
* आज रपट जाएँ (नमक हलाल - 1982)
* काटे नहीं कटते (मि. इण्डिया - 1986)
* अब के बरस यूँ बरस (आग और शोला - 1986)
* लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है (चाँदनी - 1989)
* रिमझिम-रिमझिम (1942 : ए लव स्टोरी - 1994)
* टिप-टिप बरसा पानी (मोहरा - 1994)
* घोड़े जैसी चाल (दिल तो पागल है - 1997)
* घनन-घनन घन घिर आए बदरा (लगान - 2001)
* भागे रे मन (चमेली - 2003)
* साँसों को साँसों से (हम तुम)
* देखो ना (फना - 2006)
* बरसो रे मेघा (गुरु - 2007)
Amir-Kajol
IFMIFM
सावन का मौसम आते ही सारा वातावरण रोमांटिक हो जाता है। इस रोमांटिक माहौल का लाभ उठाने में भला फिल्म वाले कैसे पीछे रह सकते हैं। नायक-नायिका के भीगते और झूमते हुए दृश्य फिल्माना हों तो वे स्टूडियो में ही सावन का माहौल बना देते हैं।

बारिश में भीगते नायक-नायिका जब गाना गाते हैं तो दर्शकों को बड़ा अच्छा लगता है। सावन पर गीतकारों ने कई गीत लिखे हैं जिनकी चर्चा अकसर होती रहती है। बात करते हैं सावन नाम पर आधारित फिल्मों की।

‘सावन’ नाम की दो फिल्में बन चुकी हैं। 1945 में प्रदर्शित फिल्म में मोतीलाल और शांता आप्टे ने काम किया था और 1959 में बनी फिल्म में भारतभूषण और अमीता थे।

1949 में प्रदर्शित किशोर साहू ने अपनी फिल्म का नाम रखा था ‘सावन आया रे’। शायद वे दर्शकों को ये बताना चाहते थे कि थिएटर में सावन आ गया है, आप फिल्म देखने आ जाएँ। 1966 में सिनेमाघरों में ‘सावन की घटा’ छाई थी।

सावन नामक फिल्मों ने बॉलीवुड को दो श्रेष्ठ नायिकाएँ भी दी हैं। रेखा और श्रीदेवी। रेखा ने बतौर नायिका ‘सावन भादो’ (1970) से शुरूआत की थी, वहीं श्रीदेवी ने 1979 में प्रदर्शित ‘सोलहवाँ सावन’ से अपनी शुरूआत की।

रेखा के लिए सावन शब्द भाग्यशाली रहा। उनकी पहली फिल्म हिट हुई। वहीं श्रीदेवी की फिल्म बुरी तरह फ्लॉप रही और कुछ बरस बाद उन्होंने ‘हिम्मतवाला’ के जरिये फिर से बॉलीवुड में प्रवेश किया। ‘सावन भादो’ नाम से 1949 में भी एक फिल्म बन चुकी है।
Ash
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धर्मेन्द्र और आशा पारीख द्वारा अभिनीत ‘आया सावन झूम के’ (1969) जबरदस्त हिट हुई थी। इस फिल्म में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत भी झूमता हुआ था।

‘सावन के गीत’ नाम की कोई कैसेट बाजार में नहीं आई थी, बल्कि यह नाम था उस फिल्म का, जिसमें संजीव कुमार और रेखा ने काम किया था। हो सकता है कि नाम समझ में नहीं आने के कारण 1978 में प्रदर्शित यह फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई हो।

‍जितेन्द्र, रीना रॉय और मौसमी चटर्जी द्वारा अभिनीत फिल्म का नाम ‘प्यासा सावन’ (1981) था, लेकिन इस फिल्म ने हिट होकर इसके निर्माता की प्यास बुझा दी। इस फिल्म का संगीत आज भी लोकप्रिय है।

इसी तरह राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म ‘सावन को आने दो’ (1979) ने भी बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता हासिल की थी।

एक निर्माता ने अपनी फिल्म का नाम रखा ‘प्यार का पहला सावन’ (1989)। नाम से ही फिल्म की कहानी पता चल जाती है। जया प्रदा ने भी ‘सावन का महीना’ (1989) नामक फिल्म बनाई थी, जिसमें उनके नायक ऋषि कपूर थे। यह फिल्म सावन का महीना तो क्या आधा महीना भी नहीं चल पाई।

1991 में दो फिल्में ऐसी आईं जिसमें सावन शब्द आया। एक निर्माता को सावन से प्यार था इसलिए उन्होंने अपनी फिल्म का नाम रखा ‘प्यार का सावन’। दूसरे महाशय सावन से कुछ नाराज नज़र आए, उन्होंने फिल्म को नाम दिया ‘आग लगा दो सावन को’। हो सकता है सावन नामक आदमी से उनकी दुश्मनी हो।

निर्माता-निर्देशक सावन कुमार अपने नाम पर मोहित नजर आए। उन्होंने अपने नाम पर ही ‘सावन’ (2006) फिल्म बना डाली जिसमें सलमान खान ने अभिनय किया था।

आपको भी कोई ऐसी फिल्म का नाम याद आए जिसमें सावन शब्द हो तो हमें जरूर बताइएगा।

मोहम्मद रफी


Rafi and Family
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पूरा नाम : मोहम्मद रफी 
जन्म : 24 दिसम्बर 1924 
जन्म स्थान : कोटला सुल्तानसिंह (पाकिस्तान) 
निधन : 31 जुलाई 1980 
कुल गीत : 4518
गैर फिल्मी गीत : 328 (237 हिंदी तथा 91 अन्य भाषाओं में)
गायक कॅरियर : 1944 से 1980 (लगभग 35 वर्ष) 
पहली फिल्म : गुल बलोच (पंजाबी) 
गीत के बोल : सोणिए नी हीरिए नी तेरी याद ने सताया 
संगीतकार : श्याम सुन्दर 
पहला रेकार्डेड हिंदी गीत : अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी-तैसी (जीएम दुर्रानी के साथ कोरस) 
अंतिम रेकार्डेड गीत : तेरे आने की आस है दोस्त, शाम क्यों उदास है दोस्त 
फिल्म : आसपास (1980- लक्ष्मीकांत प्यारेलाल- आनंद बक्षी)

राष्ट्रीय सम्मान-पुरस्कार 
1) फिल्म : नीलकमल (1968)
गीत : बाबुल की दुआएँ लेती जा

2) फिल्म : हम किसी से कम नहीं (1977)
गीत : क्या हुआ तेरा वादा

फिल्म फेयर अवॉर्ड 
1) चौहदवीं का चाँद (1960)
गीत : चौहदवीं का चाँद हो

2) ससुराल (1961)
गीत : तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को

3) दोस्ती
गीत : चाहूँगा मैं तुझे साँझ-सबेरे

4) सूरज (1966)
गीत : बहारों फूल बरसाओ

5) ब्रह्मचारी (1968)
गीत : मैं गाऊँ तुम सो जाओ

6) हम किसी से कम नहीं (1977)
गीत : क्या हुआ तेरा वादा

संगीतकार जिनके लिए रफी ने 50 से अधिक गाने गाए 
1) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल : 173
2) शंकर-जयकिशन : 119
3) चित्रगुप्त : 100
4) कल्याणजी-आनंदजी : 93
5) रवि : 79
6) राहुल देव बर्मन : 73
7) मदन मोहन : 67
8) ओपी नय्यर : 55

गीतकार जिनके लिखे गीत रफी ने 100 से अधिक गाए 
1) मजरूह सुल्तानपुरी : 374
2) आनंद बक्षी : 369
3) राजिन्दर कृष्ण : 343
4) हसरत जयपुरी : 290
5) शकील बदायूनी : 235
6) साहिर लुधियानवी : 186
7) प्रेम धवन : 160
8) भरत व्यास : 151
9) कमर जलालाबादी : 143
10) शैलेन्द्र : 141
11) वर्मा मलिक : 107
ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं
-हीर-राँझा/1970/ कैफी आजमी/मदन मोहन

बाबूल की दुआएँ लेती जा,
जा तुझको सुखी संसार मिले
- नीलकमल/1968/साहिर/रवि

आई हैं बहारें मिटे जुल्मो-सितम
प्यार का जमाना आया दूर हुए गम
-राम और श्याम/1967/शकील/नौशाद

बहारों फूल बरसाओ, मेरा मेहबूब आया है
- सूरज/1966/हसरत/शंकर-जयकिशन

कोई सागर दिल को बहलाता नहीं
बेखुदी में भी करार आता नहीं
-दिल दिया दर्द लिया/1966/शीकल/नौशाद

पुकारता चला हूँ मैं गली-गली बहार की
बस एक छाँव जुल्फ की, एक निगाह प्यार की
-मेरे सनम/1965/मजरुह/ओपी नय्यर

छू लेने दो नाजुक ओंठों को
कुछ और नहीं ये जाम है
-काजल/1965/साहिर/रवि

तेरे-मेरे सपने अब इक रंग हैं
जहाँ भी ले जाएँ राहें हम संग हैं
-गाइड/1965/शैलेन्द्र/सचिन देव बर्मन

ये मेरा प्रेमपत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना
-संगम/1964/हसरत/शंकर-जयकिशन

हमीं से मुहब्बत, हमीं से लड़ाई
अरे मार डाल, दुहाई-दुहाई
-लीडर/1964/शकील/नौशाद

तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को
किसी की नजर न लगे, चश्मे बद्दूर
- सुसुराल/1961/हसरत/शंकर-जयकिशन

नैन लड़ जई हैं, तो मनवामा कसक होइबे करी
-गंगा-जमुना/1961/शकील/नौशाद

चाहे मुझे कोई जंगली कहे
कहने दो जी कहता रहे
-जंगली/1961/शैलेन्द्र/शंकर-जयकिशन

मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
-हम दोनों/1961/साहिर/जयदेव

मधुबन में राधिका नाचे रे
गिरधर की मुरलिया बाजे रे
-कोहिनूर/1960/शकील/नौशाद



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राजकुमार संतोषी


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बात लगभग बीस वर्ष पुरानी है। ‘घायल’ की पटकथा लेकर राजकुमार संतोषी सनी देओल से मिले थे। सनी की गिनती उस समय टॉप कलाकारों में होती थी। सनी ने कहानी सुनी और संतोषी के कहानी सुनाने के अंदाज से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने पापा धर्मेन्द्र से बात की और खुद फिल्म निर्माता बनकर फिल्म बनाने का फैसला किया।

फिल्म की कहानी बहुत साधारण थी, लेकिन संतोषी ने इसे परदे पर बहुत ही प्रभावी तरीके से पेश किया। कहानी सनी की एक्शन इमेज को ध्यान में रखकर लिखी गई थी। उस समय तक सनी एक्शन तो अच्छा कर लेते थे, लेकिन अभिनय में कमजोर समझे जाते थे।

‘घायल’ ने साबित किया कि सनी अभिनय भी कर सकते हैं। 22 जून 1990 को यह फिल्म प्रदर्शित हुई। इसी दिन आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘दिल’ भी प्रदर्शित हुई थी, जिसका दर्शकों में क्रेज था। लेकिन ‘घायल’ ने भी जबरदस्त सफलता हासिल की।

सनी को प्रशंसा और पुरस्कार मिलें और उनकी संतोषी से बहुत अच्छी दोस्ती हो गई। संतोषी भी सनी के एहसानों के तले दब गए क्योंकि सनी ने उन पर विश्वास किया और एक बड़ा अवसर दिया।

इसके बाद संतोषी ने सनी को लेकर ‘दामिनी’ और ‘घातक’ बनाने की घोषणा की। ‘दामिनी’ एक संदेश प्रधान फिल्म थी, जिसे संतोषी ने मनोरंजक अंदाज में पेश किया। इस फिल्म में सनी संक्षिप्त लेकिन बहुत ही असरदार भूमिका में दिखाई दिए। इस फिल्म के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले।

संतोषी की इस फिल्म में भी नायिका मीनाक्षी शेषाद्रि थी। मीनाक्षी को लगातार अपनी फिल्मों में लेने का राज उस समय खुला जब संतोषी ने एक दिन मीनाक्षी के आगे अपने प्यार का इजहार कर दिया। मीनाक्षी इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थी और पूरा मामला वन वे ट्रेफिक की तरह था।

मीनाक्षी ने संतोषी के प्यार को ठुकरा दिया और ऐसा लगने लगा कि संतोषी की फिल्म ‘घातक’ रूक जाएगी। लेकिन दोनों ने व्यावसायिक कलाकार होने का सबूत देते हुए फिल्म पूरी की।

सनी को पीठ के दर्द की समस्या थी और वे महीनों शूटिंग नहीं कर पाए। खाली समय का सदुपयोग करते हुए संतोषी ने आमिर खान और सलमान खान को लेकर ‘अंदाज अपना-अपना’ बनाई।

उस समय आमिर और सलमान ‘ईगो प्राब्लम’ जैसी बीमारी का शिकार नहीं हुए थे और उन्होंने साथ में काम किया। हास्य से भरी इस फिल्म को दर्शकों ने बहुत पसंद किया और आज भी टेलीविजन पर इसे दर्शक बड़े चाव से देखते हैं।

संतोषी ने ‘घातक’ (1996) को इस थीम पर बनाया कि यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो तो हिंसा को चुनना चाहिए। सनी देओल से उन्होंने एक बार फिर जबरदस्त अभिनय कराया। फिल्म की पटकथा बेहद सशक्त थी और दर्शकों को फिल्म पसंद आई।

संतोषी ने सामाजिक (दामिनी), एक्शन (घायल व घातक) तथा हास्य (अंदाज अपना अपना) फिल्म बनाकर दर्शाया कि वे हर तरह की फिल्म सफलतापूर्वक बना सकते हैं। उनके कहानी कहने का तरीका बेहद उम्दा है और उनके चरित्र बेहद ठोस होते हैं। उनकी छवि एक ऐसे निर्देशक की बनी जो कलाकारों से बहुत अच्छा काम लेते हैं। अनिल कपूर, अजय देवगन, सनी देओल, माधुरी दीक्षित ने संतोषी की फिल्म में काम कर कई पुरस्कार जीते

प्रेम धवन


कितनी ही सुरीली धुन हो, आकर्षक संगीत हो लेकिन यदि बोल गहरे नहीं हों, भाव मीठे नहीं हों, तो फिल्म संगीत मन को स्पर्श नहीं कर पाता। फिल्मोद्योग में लेखनी के चमत्कारी सूर्य-पुरुष कम नहीं हैं।

प्रेम धवन ऐसा ही एक नाम है जिनकी कलम की नोक से ओजस्वी और भावुक शब्दों की सरिता बही है। प्रेम उन गीतकारों में थे जिन्होंने जितना लिखा, सार्थक लिखा। सकारात्मक लिखा और संवेदनशील होकर लिखा। साहित्य में गहरी अभिरुचि के बाद भी उनके गीतों में सरल काव्यात्मकता नजर आती है, जटिल शब्दों की भरमार नहीं।

13 जून 1923 को अंबाला में जन्मे प्रेम धवन ने लाहौर के एफसी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। मशहूर गीतकार साहिर उनके सहपाठी थे और पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल सीनियर छात्र। साहिर और प्रेम यूनियन के सक्रिय कार्यकर्ता रहे। कॉलेज की पत्रिका में दोनों ने जमकर लिखा। साहिर गजल रचते थे और प्रेम, गीत लिखते थे।

प्रेम धवन आगे चलकर कांग्रेस पार्टी से भी जुड़े। शिक्षा के बाद ‘पीपुल्स थियेटर ग्रुप’ में शामिल हुए। जिसके द्वारा चार वर्षों तक नृत्य और संगीत का प्रशिक्षण लिया। कम लोग जानते हैं कि प्रेम धवन ने लगभग 50 फिल्मों में नृ्त्य निर्देशन किया। फिल्म ‘नया दौर’ का उड़े जब-जब जुल्फें तेरी- प्रेम धवन के ही निर्देशन का कमाल था।

फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ के गीत ‘हरियाला सावन ढोल बजाता आया’ में तो प्रेम थिरके भी हैं। जब थिएटर ग्रुप असमय ही बिखरा, तो लेखिका इस्मत चुगताई बॉम्बे टॉकीज ले गईं। जहाँ फिल्म ‘जिद्‍दी’ के लिए पहला ब्रेक मिला। गायिका लता मंगेशकर का ‘चंदा जा रे जा रे...’ (संगीत- खेमचंद प्रकाश) पहला हिट इसी फिल्म में था।

यहाँ से बॉम्बे टॉकीज ने गीत लेखन और नृत्य निर्देशन के लिए उन्हें अनुबंधित कर लिया। अनुबंध के बाद जब स्वतंत्र लेखन किया, तब संगीतकार अनिल बिस्वास/सलिल चौधरी/मदनमोहन और चित्रगुप्त के साथ अच्छा तालमेल रहा। आखिरी बार प्रेम ने फिल्म ‘अप्पूराजा’ के लिए लिखा। भावुक इतने थे कि अपनी लोरी ‘तुझे सूरज कहूँ या चंदा...मेरा नाम करेगा रोशन’ को रचते हुए कई बार रो पड़े।

फिल्म के किरदार को शिद्दत से महसूस करने के बाद वे लिखते थे। फिल्म ‘एक साल’ में नायिका, नायक अशोक कुमार को चाहती है। जब नायक महसूस करता है और लौटकर आता है तब वह कैंसर की मरीज होकर मृत्युशैया पर है। इसे अपने दिल की गहराई में उतारकर उन्होंने रचा-

सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया 
दिन में अगर चिराग जलाए तो क्या किया 
ले-ले के हार फूलों का आई तो थी बहार 
नजरें उठा के हमने ही देखा न एक बार... 
आँखों से अब ये पर्दे हटाए तो क्या किया! 

आज कहाँ बचे हैं ऐसे गीतकार? सात मई 2001 को मुंबई के जसलोक अस्पताल में प्रेम धवन हार्ट अटैक में चल बसे। दिल को छू लेने वाले गीतों में प्रेम की याद हमेशा बनी रहेगी।

प्रेम धवन के लोकप्रिय गीत 
* बोल पपीहे बोल रे (आरजू)
* सीने में सुलगते हैं अरमाँ (तराना)
* चंदा मामा दूर के (वचन)
* दिन हो या रात हम रहें तेरे साथ (मिस बॉम्बे)
* जिंदगी भर गम जुदाई का (मिस बॉम्बे)
* छोड़ो कल की बातें (हम हिन्दुस्तानी)
* अँखियन संग अँखियाँ लागी (बड़ा आदमी)
* ऐ मेरे प्यारे वतन (काबुलीवाला)
* तेरी दुनिया से दूर चले हो के मजबूर (जबक)
* महलों ने छीन लिया बचपन का (जबक)
* ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी कसम (शहीद)
* मेरा रंग दे बसंती चोला (शहीद)
* तेरी दुनिया से हो के मजबूर चला (पवित्र पापी)

कैफी आजमी


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नर्म नाजुक शब्दों से सजे न जाने कितने ऐसे गीत हैं जिनसे कैफी आजमी की सौंधी महक आती है। संजीदा और सलीकेदार शायरी में मधुर गीत रचकर कैफी इस दुनिया से रुखसत हो गए। उनकी कलम से झरे खूबसूरत बोलों की रंगत खुशबू और ताजगी आज भी वैसी ही है। कैफी की कलम का ‍करिश्मा ही था कि वे ‘जाने क्या ढूँढती रहती है ये आँखें मुझमें’, जैसी कलात्मक रचना के साथ सहज मजाकिया ‘परमिट, परमिट, परमिट....परमिट के लिए मरमिट’ लिखकर संगीत रसिकों को गुदगुदा गए।

कैफी (असली नाम : अख्तर हुसैन रिजवी) उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के छोटे से गाँव मिजवान में सन 1915 में जन्मे। गाँव के भोलेभाले माहौल में कविताएँ पढ़ने का शौक लगा। भाइयों ने प्रोत्साहित किया तो खुद भी लिखने लगे।

किशोर होते-होते मुशायरे में शामिल होने लगे। वर्ष 1936 में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और सदस्यता ग्रहण कर ली। धार्मिक रूढि़वादिता से परेशान कैफी को इस विचारधारा में जैसे सारी समस्याओं का हल मिल गया। उन्होंने निश्चय किया कि सामाजिक संदेश के लिए ही लेखनी का उपयोग करेंगे।

1943 में साम्यवादी दल ने मुंबई कार्यालय शुरू किया और ‍उन्हें जिम्मेदारी देकर भेजा। यहाँ आकर कैफी ने उर्दू जर्नल ‘मजदूर मोहल्ला’ का संपादन किया।

जीवनसंगिनी शौकत से मुलाकात हुई। आर्थिक रूप से संपन्न और साहित्यिक संस्कारों वाली शौकत को कैफी के लेखन ने प्रभावित किया। मई 1947 में दो संवेदनशील कलाकार विवाह बंधन में बँध गए। शादी के बाद शौकत ने रिश्ते की गरिमा इस हद तक निभाई कि खेतवाड़ी में पति के साथ ऐसी जगह रहीं जहाँ टॉयलेट/बाथरूम कॉमन थे। यहीं पर शबाना और बाबा का जन्म हुआ।

बाद में जुहू स्थित बंगले में आए। फिल्मों में मौका बुजदिल (1951) से मिला। स्वतंत्र रूप से लेखन चलता रहा। कैफी की भावुक, रोमांटिक और प्रभावी लेखनी से प्रगति के रास्ते खुलते गए और वे सिर्फ गीतकार ही नहीं बल्कि पटकथाकार के रूप में भी स्थापित हो गए। ‘हीर-रांझा’ कैफी की सिनेमाई कविता कही जा सकती है। सादगीपूर्ण व्यक्तित्व वाले कैफी बेहद हँसमुख थे, यह बहुत कम लोग जानते हैं।

वर्ष 1973 में ब्रेनहैमरेज से लड़ते हुए जीवन को एक नया दर्शन मिला - बस दूसरों के लिए जीना है। अपने गाँव मिजवान में कैफी ने स्कूल, अस्पताल, पोस्ट ऑफिस और सड़क बनवाने में मदद की।

उत्तरप्रदेश सरकार ने सुल्तानपुर से फूलपुर सड़क को कैफी मार्ग घोषित किया है। दस मई 2002 को कैफी यह गुनगुनाते हुए इस दुनिया से चल दिए : ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं...।

कैफी के प्रमुख गीत 
* मैं ये सोच के उसके दर से उठा था...(हकीकत)
* है कली-कली के रुख पर तेरे हुस्न का फसाना...(लालारूख)
* वक्त ने किया क्या हसीं सितम... (कागज के फूल)
* इक जुर्म करके हमने चाहा था मुस्कुराना... (शमा)
* जीत ही लेंगे बाजी हम तुम... (शोला और शबनम)
* तुम पूछते हो इश्क भला है कि नहीं है... (नकली नवाब)
* राह बनी खुद मंजिल... (कोहरा)
* सारा मोरा कजरा चुराया तूने... (दो दिल)
* बहारों...मेरा जीवन भी सँवारो... (आखिरी रात)
* धीरे-धीरे मचल ए दिल-ए-बेकरार... (अनुपमा)
* या दिल की सुनो दुनिया वालों... (अनुपमा)
* मिलो न तुम तो हम घबराए... (हीर-रांझा)
* ये दुनिया ये महफिल... (हीर-रांझा)
* जरा सी आहट होती है तो दिल पूछता है... (हकीकत)

राहुल देव बर्मन


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कामयाब पिता की संतान भी कामयाब हो, ऐसा बहुत कम होता है क्योंकि विशाल वृक्ष के नीचे पौधा ठीक से पनप नहीं पाता। लेकिन विरले उदाहरण भी हैं। जैसे सचिन देव बर्मन और आर.डी. बर्मन। बर्मन परिवार ने अपने मधुर संगीत के जरिए करोड़ों लोगों का मनोरंजन किया है। निराशा के समय प्रेरणा दी और दर्द के समय अपने संगीत के जरिए राहत।

सचिन देव बर्मन नामी संगीतकार थे और उनके घर संगीत जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों का आना-जाना लगा रहता था। उनकी महफिलें जमती थीं और छोटे राहुल भी उसमें गुपचुप हिस्सा लिया करते थे। संगीत का जादू उन पर बचपन से छा गया था।

कैसे पड़ा पंचम नाम? 
आरडी को पंचम नाम से फिल्म जगत में पुकारा जाता था। पंचम नाम के पीछे मजेदार किस्सा है। आरडी बचपन में जब भी गुनगुनाते थे, प शब्द का ही उपयोग करते थे। यह अभिनेता अशोक कुमार के ध्यान में आई। सा रे गा मा पा में ‘प’ का स्थान पाँचवाँ हैं। इसलिए उन्हें राहुल देव को पंचम नाम से पुकारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका यही नाम लोकप्रिय हो गया।

मेहमूद ने दिया पहला अवसर 
एसडी बर्मन की वजह से आरडी को फिल्म जगत के सभी लोग जानते थे। पंचम को माउथआर्गन बजाने का बेहद शौक था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल उस समय ‘दोस्ती’ फिल्म में संगीत दे रहे थे। उन्हें माउथआर्गन बजाने वाले की जरूरत थी। वे चाहते थे कि पंचम यह काम करें, लेकिन उनसे कैसे कहें क्योंकि वे एक प्रसिद्ध संगीतकार के बेटे थे। जब यह बात पंचम को पता चली तो वे फौरन राजी हो गए। मेहमूद से पंचम की अच्छी दोस्ती थी। मेहमूद ने पंचम से वादा किया था कि वे स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्हें जरूर अवसर देंगे। ‘छोटे नवाब’ के जरिए मेहमूद ने अपना वादा निभाया।

सीढि़यों पर बैठकर लता ने गाना गाया
अपनी पहली फिल्म में ‘घर आजा घिर आए बदरा’ गीत आरडी लता मंगेशकर से गवाना चाहते थे और लता इसके लिए राजी हो गईं। आरडी चाहते थे कि लता उनके घर आकर रिहर्सल करें। लता धर्मसंकट में फँस गईं क्योंकि उस समय उनका कुछ कारणों से आरडी के पिता एसडी बर्मन से विवाद चल रहा था। लता उनके घर नहीं जाना चाहती थीं। लता ने आरडी के सामने शर्त रखी कि वे जरूर आएँगी, लेकिन घर के अंदर पैर नहीं रखेंगी। मजबूरन आरडी अपने घर के आगे की सीढि़यों पर हारमोनियम बजाते थे और लता गीत गाती थीं। पूरी रिहर्सल उन्होंने ऐसे ही की।

सफलता की सीढ़ी चढ़ी 
एसडी बर्मन हमेशा आरडी को अपने साथ रखते थे। इस वजह से आरडी को लोकगीतों, वाद्यों और आर्केस्ट्रा की समझ बहुत कम उम्र में हो गई थी। जब एसडी ‘आराधना’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तब काफी बीमार थे। आरडी ने कुशलता से उनका काम संभाला और इस फिल्म की अधिकतर धुनें उन्होंने ही तैयार की। आरडी को बड़ी सफलता मिली ‘अमर प्रेम’ से। ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे यादगार गीत देकर उन्होंने साबित किया कि वे भी प्रतिभाशाली हैं।

प्रयोग के हिमायती आरडी 
को संगीत में प्रयोग करने का बेहद शौक था। नई तकनीक को भी वे बेहद पसंद करते थे। उन्होंने विदेश यात्राएँ कर संगीत संयोजन का अध्ययन किया। सत्ताईस ट्रेक की रिकॉर्डिंग के बारे में जाना। इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया। कंघी और कई फालतू समझी जाने वाली चीजों का उपयोग उन्होंने अपने संगीत में किया। भारतीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का उन्होंने भरपूर उपयोग किया।

युवा संगीत
आरडी द्वारा संगीतबद्ध की गई फिल्में ‘तीसरी मंजिल’ और ‘यादों की बारात’ ने धूम मचा दी। राजेश खन्ना को सुपर सितारा बनाने में भी आरडी बर्मन का अहम योगदान है। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आरडी बर्मन की तिकड़ी ने 70 के दशक में धूम मचा दी थी। आरडी का संगीत युवा वर्ग को बेहद पसंद आया। उनके संगीत में बेफिक्री, जोश, ऊर्जा और मधुरता है, जिसे युवाओं ने पसंद किया। ‘दम मारो दम’ जैसी धुन उन्होंने उस दौर में बनाकर तहलका मचा दिया था। जब राजेश खन्ना का सितारा अस्त हुआ तो आरडी ने अमिताभ के लिए यादगार धुनें बनाईं।

आरडी का संगीत आज का युवा भी सुनता है। समय का उनके संगीत पर कोई असर नहीं हुआ। पुराने गानों को रीमिक्स कर आज पेश किया जाता है, उनमें आरडी द्वारा संगीतबद्ध गीत ही सबसे अधिक होते हैं।

ऐसा नहीं है कि आरडी ने धूम-धड़ाके वाली धुनें ही बनाईं। गीतकार गुलजार के साथ आरडी एक अलग ही संगीतकार के रूप में नजर आते हैं। ‘आँधी’, ‘किनारा’, ‘परिचय’, ‘खूशबू’, ‘इजाजत’, ‘लिबास’ फिल्मों के गीत सुनकर लगता ही नहीं कि ये वही आरडी हैं, जिन्होंने ‘दम मारो दम’ जैसा गाना बनाया है।

समय से आगे के संगीतकार 
आरडी बर्मन के बारे में कहा जाता है कि वे समय से आगे के संगीतकार थे। उन्होंने अपने संगीत में वे प्रयोग कर दिखाए थे, जो आज के संगीतकार कर रहे हैं। आरडी का यह दुर्भाग्य रहा कि उनके समय में फिल्मों में एक्शन हावी हो गया था और संगीत के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फिल्म जगत नहीं कर पाया। 4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक ढेर सारे गीत वे दे गए।

राहुल देव बर्मन के बारे में अधिक जानकारी के लिए.............यहाँ क्लिक करे 

मदनमोहन


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अपने जीवनकाल में सबसे बेहतर संगीत रचना करने और लता मंगेशकर जैसी गायिका से सर्वोत्तम गीत गवाने के बावजूद मदनमोहन को जो लोकप्रियता उस दौर में मिलना थी, वह नहीं मिली। उन्हें उनकी मौत के बाद याद किया गया और उनके महत्व को समझा गया।

संगीत के बेताज बादशाह 
संगीत में मदनमोहन के बारे में संगीतकार खय्याम का कहना है कि वे संगीत के बेताज बादशाह थे। संगीत की‍ जितनी विविधताएँ होती हैं, उन सबका उन्हें गहरा ज्ञान एवं समझ थी। जबकि उन्होंने शास्त्रीय अथवा सुगम संगीत का बाकायदा कोई प्रशिक्षण नहीं लिया था। मदनमोहन अपनी रचनाओं के जरिये जो श्रोताओं को दे गए, वे अनमोल खजाने के समान है।

सेना छोड़ ग्लैमर वर्ल्ड में 
बॉम्बे टॉक‍िज फिल्म कंपनी के एक निर्दे‍शक रायबहादुर चुन्नीलाल कोहली के वे बेटे थे। चुन्नीलाल ने बाद में फिल्मिस्तान की नींव रखी और नामी फिल्मों के साथ कई सितारे फिल्माकाश को दिए। वे नहीं चाहते थे कि उनका बेटा ग्लैमर की इस दुनिया में कदम रखे, लेकिन फिल्मी दुनिया का आकर्षण मदनमोहन में इतना जबरदस्त था कि उन्होंने सेना की नौकरी छोड़कर ऑल इंडिया रेडियो (लखनऊ) ज्वॉइन कर लिया। यहाँ काम करते हुए उन्हें न केवल संगीत-राग रागिनियों का ज्ञान मिला, बल्कि देश के शास्त्रीय-सुगम गायक-गायिकाओं, वादक और संगीतकारों के सम्पर्क में आकर उन्होंने बहुत कुछ सीखा। गजल गायिका बेगम अख्तर और बरकतअली साहब का उन पर विशेष प्रभाव हुआ। बाद में फिल्मों में मौका मिलने पर मदनमोहन ने जो बंदिशें रची- ‘मैंने रंग दी आज चुनरिया’, ‘जिया ले गयो जी मोरा सांवरिया’, नैनों में बदरा छाए’ इन पर बरकतअली साहब का प्रभाव सीधे-सीधे देखा जा सकता है।

बेगम अख्तर का प्रभाव 
बेगम अख्तर की गजल गायन का प्रभाव भी मदनमोहन की बंदिशों में सुनने को मिलता है। कहा तो यहाँ तक जाता है कि मदनमोहन जैसी गजलों की रचना करने में कोई फिल्म संगीतकार सफल नहीं हुआ है। मदनमोहन की कुछ लाजवाब गजलें हैं- ‘उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते’, ‘आज सोचा तो आँसू भर आए’, ‘आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे’, ‘इसी में प्यार की आरजू’ और ‘हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ, आराम कहाँ’।


भीड़ से अलग चेहरा 
अपने समकालीन संगीतकारों में मदनमोहन भीड़ में अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे, लेकिन उन्हें अधिक अवसर नहीं मिले। गीत की रचना और शब्दावली पर उनकी पैनी नजर रहती थी। वे पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ गीतों को सुरबद्ध करते थे। पार्श्व गायकों के प्रति उनके मन में सम्मान होता था और आत्मीयता के साथ उनसे गवाते थे।

मदन भैया 
लताजी को वे सदैव बहन मानते थे और बदले में लताजी उन्हें सारे जीवन मदन भैया पुकारती रही। लताजी ने कहा था ‘दूसरे संगीतकारों ने मुझे गाने (साँग्स) दिए हैं, जबकि मदन भैया ने गाना (संगीत) दिया है।‘